गुवाहाटी, 23 दिसम्बर (आईएएनएस)| कम होते तापमान के साथ असम और खासतौर पर ग्रामीण इलाकों के लोग 'ना खोवा' के त्योहार के साथ उत्सवी माहौल में नजर आ रहे हैं।
'ना खोवा' ईश्वर को अच्छी फसल के लिए धन्यवाद देने के लिए आयोजित की जाने वाली सदियों पुरानी सामुदायिक दावत है।ऊपरी असम के शिवसागर जिले में स्थित डेमॉ इलाके के छह गांव शनिवार को 'ना खोवा' उत्सव मनाने के लिए साथ आए हैं।आयोजनकर्ताओं को इस बार सामुदायिक दावत में 1,800 से भी अधिक लोगों के सम्मलित होने की उम्मीद है।नम्बर 2 लाही मोरोंजियाल गांव के थानेश्वर बोरा ने आईएएनएस को बताया, "छह नजदीकी गांवों के सभी 4,000 परिवार इस साल ना खोवा में सम्मिलित हो रहे हैं। काफी लंबे समय बाद यह मौका आया है। हमने उत्सव से जुड़े सभी इंतजामों के लिए एक समिति का गठन किया है।"उन्होंने कहा कि बाढ़ और धान के खेतों में कीड़ों के प्रकोप के बावजूद इस बार फसल थोड़ी अच्छी हुई है और इसलिए यह ईश्वर का आभार व्यक्त करने और समुदाय के साथ मिलकर यह उत्सव मनाने का समय है।'ना खोवा' लंबे समय से उनके गांव की पंरपरा रही है।गांव के एक शिक्षक सुरेश बरुआ ने कहा, "हालांकि, हाल ही में कुछ समस्याओं के कारण इसे हर साल नहीं मनाया जा रहा। इस साल गांव के युवाओं ने पड़ोसी गांवों के साथ मिलकर यह पहल की है।"बरुआ ने कहा, "आधुनिक जिंदगी की जटिलताओं के कारण हम अपनी संस्कृति और परंपराएं भूलते जा रहे हैं। न केवल इस पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित करने का, बल्कि समुदायों के बीच लोगों का आपसी संपर्क बढ़ाने का युवाओं की ओर से किया गया यह प्रयास सराहनीय है।"उत्सव में शामिल सभी छह गांवों के हर घर ने चावल, सब्जी, बतखों, मछलियों या उत्सव के लिए जरूरी अन्य सामान में से कुछ न कुछ देकर किसी न किसी रूप में इसमें योगदान दिया है।उत्सव के भोज में नई कटी धान की फसल के चावल, दाल, सब्जी, लौकी के साथ बतख की करी, फिश करी, मसले आलू और अन्य कई व्यंजन शामिल होंगे।बरुआ ने कहा, "हम इसे परंपरा के अनुरूप मनाएंगे। पहले समुदाय के वरिष्ठजन ईश्वर को भोज समर्पित करेंगे और हम अपने पुरखों को हमें आशीर्वाद देने की प्रार्थना करेंगे। उसके बाद पूरे समुदाय में भोज बांटा जाएगा।"बरुआ ने बताया कि उत्सव में सामुदायिक भोज के अलावा नाच गाना और मौज मस्ती भी होगी।शिलांग की नॉर्थ इस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (नेहु) में प्रोफेसर द्विजेन शर्मा ने आईएएनएस को बताया, "सदियों से असम के गांवों के लोग एक दूसरे की मदद से खेतीबाड़ी करते रहे हैं। इसे एक सामुदायिक जिम्मेदारी के रूप में किया जाता है।"शर्मा ने कहा, "ना खोवा केवल आभार व्यक्त करने का उत्सव ही नहीं है, बल्कि यह समुदाय के बीच समझ और आपसी रिश्ते की मजबूती का एक महत्वूपर्ण मौका भी है।"--आईएएनएस
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