लंदन, 18 दिसम्बर (आईएएनएस)| अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविदों के एक समूह ने बाल श्रम को हानिकारक बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने की संयुक्त राष्ट्र की नीति की निंदा की है। उनका कहना है कि यह पश्चिमी देशों के दुराग्रह को दिखाता है और इसके (बाल श्रम के) फायदों की अनदेखी करता है। गार्डियन की रविवार की रिपोर्ट के मुताबिक, समाचार पत्र 'द ऑब्जर्वर' को लिखे एक पत्र में शिक्षाविदों ने तर्क दिया है कि छोटे बच्चों को काम करने की अनुमति देने का सकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया है।
बाल विकास और मानवाधिकार के क्षेत्रों में काम करने वाले शोधकर्ताओं ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र समिति ने 'पुराने और कम जानकारी' वाले पश्चिमी पूर्वाग्रहों के दबाव में उपलब्ध साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया है।एक हस्ताक्षरकर्ता यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स में स्कूल ऑफ ग्लोबल स्टडीज की डोर्टे थॉरसेन ने कहा, "बच्चों पर काम करने से प्रतिबंध लगाकर आप उन्हें स्कूल वापस नहीं ला सकते। बल्कि अगर वह अपने स्कूल की फीस देने के लिए काम कर रहे हैं, तो शायद इसका उल्टा असर होगा।"उन्होंने भारत और अफ्रीकी देशों की ओर इशारा करते हुए कहा, " हम इसे जुल्म और अत्याचार की कहानी के विपरीत बाल श्रमिकों के सामूहीकरण आंदोलन के रूप में देख रहे हैं, उनका एकीकरण देख रहे हैं, जहां वे राजनीति में भाग लेने की कोशिश कर रहे हैं, सुने जाने का प्रयास कर रहे हैं।"टोरंटो स्थित अंतर्राष्ट्रीय बाल संरक्षण नेटवर्क में बाल विकास विशेषज्ञ रिचर्ड कैरोथर्स ने संयुक्त राष्ट्र की नीति को 'बड़ी नौकरशाही अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों का हठी रवैया' बताया।उन्होंने कहा, "बच्चों को बुरी स्थितियों से बचाना जरूरी है और इस बात पर बहस जारी है कि बुरी स्थितियों में काम करने वाले बच्चों की संख्या छोटी है या बेहद छोटी।"थोरसेन ने बाल श्रम की जांच करने के लिए ब्रिटिश कंपनियों पर दबाव डालने को लेकर ब्रिटेन की अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग मंत्री प्रीति पटेल की भी आलोचना की।विशेषज्ञों ने उन बच्चों का भी जिक्र किया, जिन्हें इस वजह से खतरनाक या अवैध काम के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उनके लिए नियमों के हिसाब से चलाए जा रहे रोजगार का रास्ता बंद हो गया था।संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के लक्ष्य के तहत करीब 193 देश 2025 तक बाल श्रम समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।--आईएएनएस
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